सर्जिकल स्ट्रा
तुम न मानो न ही मानो
पर शीश हमारा ही झुकता है,
भारत भूमि से कर रुसवाई,
निर्माण तुम्हारा होता है !
तुम इस भूमि को जनक मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
धर्म जाति को आधार बना,
भारत का सीना चीरा जाता है,
हिन्दुकुश, सिन्धु ,हिंद सागर तक का,
वैभव छीना जाता है,
तुम इस भूमि को जनक मानो तो
शीश हमारा ही झुकता है 1
भारत वैभव के खंड-विखन्ड़ पर,
निर्माण तुम्हारा होता है,
भूखा,नन्गा रह हर किसान तब,
तुम्हारे लिये ही धन जुटाता है,
उस किसान का कर्ज न मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
वसुदेव कुटुम्बकम की परंपरा को,
भूमि के टुकड़ों की कीमत पर,
पर शीश हमारा ही झुकता है,
भारत भूमि से कर रुसवाई,
निर्माण तुम्हारा होता है !
तुम इस भूमि को जनक मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
धर्म जाति को आधार बना,
भारत का सीना चीरा जाता है,
हिन्दुकुश, सिन्धु ,हिंद सागर तक का,
वैभव छीना जाता है,
तुम इस भूमि को जनक मानो तो
शीश हमारा ही झुकता है 1
भारत वैभव के खंड-विखन्ड़ पर,
निर्माण तुम्हारा होता है,
भूखा,नन्गा रह हर किसान तब,
तुम्हारे लिये ही धन जुटाता है,
उस किसान का कर्ज न मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
वसुदेव कुटुम्बकम की परंपरा को,
भूमि के टुकड़ों की कीमत पर,
हस कर निभाया जाता है,
देशी विदेशी हर एक मानुष को,
बगल बिठाया जाता है,
तुम इस माटी का कर्ज मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
देशी विदेशी हर एक मानुष को,
बगल बिठाया जाता है,
तुम इस माटी का कर्ज मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
मृदुल चंद्र श्रीवास्तव
माँ भारती के चरणो में
अर्पित।