Sunday, November 20, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक

हाथ खोल दो सेना के, कश्मीर क्या लाहौर भी गैर न होगा, जिस
घर भी तिरंगा न सजे, उसका खैर न होगा ll
भरने दो हुंकार इन्हें , मातृभूमि के अभिमान है वे,
बजने दो मृदंग, कर दो संखनाद ये
भारत भूमि का तिलक करो, नये अध्याय का प्रारम्भ करो,
दो एक कड़ा सन्देश उन्हें, जीने दें और प्रेम से जीना सीखलें,
आतंक के विनाश का प्रारम्भ करे, ये के अपने विनाश के दिन गिनना 😊llआरम्भ करें ll😊                  
  
                           


स्वप्न लोक

मेरा क्या में तो वैराग्य लिए वैरागी हो जाऊं,
आँखें झपकूँ तो बुद्ध ,महावीर और कृष्ण भी कहलाऊँ,
यही सोच कर खुश हो लेता हूँ, 1 के बदले 100 की कसम में फिर लेता हूँ,
संग चलो स्वप्न लोक के , वो धन भी तुम्हें दिखलाता हूँ,
कल भी बोला था, फिर वही बात दुहराता हूँ,
चलो फिर, स्वप्न लोक में, उन्हीं नैनों की ओट में, कहो तो मैं फिर वो पम्पलेट छपवाता हूँ,                                                                                                1 के बदले 100 की कसम में फिर दुहराता हूँ,
चलो स्वप्न लोक में वो धन तुम्हें दिखलाता हूँ ll                       



!! हे मानव !!

भूमिका ~
हाल में ही एक व्यक्ति (मांझी) ने अपनी पत्नी की मृत्यु के पश्चात अस्पताल से उसके मृत शरीर को कंधें पर लादे घर को निकल पडे, क्योंकि इस काम के लिए अस्पताल प्रशासन के पास तत्काल कोई सुविधा उपलब्ध नही थी,अब ऐसे घड़ी में जब उसके ऊपर ऐसा संकट हो, क्या अपेक्षा की जा सकती है कि व्याकुल और बदहवासी में व्यक्ति सही निर्णय लेगा ? नही की जा सकती, ऐसे में दायित्व अस्पताल प्रशासन का ही होता है, पूरे देश से, एक भी मदत की पेशकश नही आई जबकि पाक में आतंकी हमले में मरे लोग  को मुद्राएं दान करने वाले लोग दिख जाते थे, फिर इस बारी क्या पता ?
एक विदेशी राजनयिक ने उसके परिवार, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सहयोग की पेशकश की जिसे जरूयत मंद, माझी ने स्वीकार भी किया l

ददलानी ने एक भद्र धार्मिक, सरल व्यक्ति पर ट्वीटर के माध्यम से आपत्ति जनक शब्द व चित्र साझा किए, निश्चय ही धर्मिक स्वतंत्रता और निजता उन्हें ये अधिकार देती है, ददलानी कुंठित हुए इस बात को भूल जाते है और फिर पूरे देश में धर्मयोगियो की धार्मिक भावनाएं आहत हो गईं l उत्तर प्रदेश के शामली/बुलंदशहर, नामक शहरो से दुराचार की विभत्स घटना प्रकाश में आती है, किन्तु इस बात पर यही धर्मवीर खामोश रह जाते हैंl

"धर्म मनुष्य के उत्तम जीवन जीने के लिए दिशा निर्देश है पर विडम्बना है कि धर्म के समक्ष इंसानियत की कोई कीमत ही शेष नही रहा ll



~ रचना ~

क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,कही स्वयं ही मृत हो, तो कही मृत की हड्डियां भी तोड़ देते हो,
मृत/परिवार को जो न दे सको संवेदना, पर भूल न जाओ वो दर्द, वो वेदना,
हे मानव,                                     क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
सड़क पर चोटिल,लहूलुहान व्यक्ति के दुःख तो न हर लोगो !                                                                        पर उसे तड़पता देख मुख जरूर मोड़ लोगे,
धार्मिक हो पूजा पाठ करते हो, करो आराधना,                                                                                           पर तुम क्यों नहीं कर पाते हो सत्य का सामना,
हे मानव,
क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
कहीं स्वयं मृत हो तो कही मृतक की हड्डियां भी तोड़ देते हो,
कमी है देश में किस बात की वो बस, हाथ फेर दशा न बदल दें गरीबो की,
फिर क्यों विदेशों से भीख की पेशकश होने देते हो,
बताओ मुझे ददलानी पर शर्मिंदा हो, तो यहां मुख क्यों मोड़ लेते हो,
पैसे के लिए खुद्दारी की कीमत नही चुकाते हम,
मुह मोड़ लो तो क्या पर इस दुर्दशा के जिम्मेदार है हम,
हे मानव,                                                                                                         
क्यों स्वयं के ही अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
कही खुद मित्र हो कही मृतक की हड्डियां तोड़ देते हो,
निर्भया, दामिनी, शामली इनके भी गुनहगार हैं हम,
पर देखो कहीं धर्म की हो न जाय खोटी,खींच लोगे तलवारें और बहादोगे तुम खून,
कभी सोचा है जो बह गया सडको पर,वो कितनी बड़ी थी भूल l  
इस बात पर कब होंगे शर्मिन्दा,कब एक जुट हो करोगे तुम इसकी निंदा,
कब उठाओगे कर्तव्य - कर्म का भार,
कब करोगे ऐसे रावणो पे वार,     
हे मानव,                                                               क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,                                                                                               कही स्वयं मृत हो तो कहीं मृतक की हड्डियां तोड़ देते हो,                                                                        कुछ कर्म है, कुछ धर्म भी, जीव से ही सत्कर्म भी,
फिर क्यों नही करते खुल कर इसकी निंदा, क्यों करते हो तुम इंसानियत को शर्मिंदा

मृदुल चंद्र श्रीवास्तव                     







       अन्ना-आंदोलन

 आंदोलन कहो या कहो तुम जीवन,जो चाहो दे लो नाम,चाहो तो कर लो अप-मान,पर सुनो, थी वो सत्य का ही ललकार, देखो झूठ पर जो किया प्रहार,वर्षो के उस अंध तंत्र को,भारत भूमि के नन्द वंश को,                                   खोली उसने कब वो चोटी, बस पहन एक संत की  टोपी,देखो कैसा आगाज हुआ था, स्तब्ध नन्द समाज हुआ था,
भारत भूमि के उस अन्धकार को,अहंकार के असत्य मॉन को फौलाद खडा जो घूर रहा था अकेले हर चुनौती क़ुबूल रहा था,गुरु आशीष लेे लिया उपवास,                                                                             हठ योगी हठ को ठान,धरती हिली, भयभीत काल भी,
देखो वो कैसा अनुष्ठान हुआ था, कण-कण देशप्रेम और गुलजार हुआ था,   
                                                                                               राज्य-नीति को जो कोस रहे थे,वो हैरत में सोच रहे थे,वेशभूषा का कैसा उपवन,
मुख पे क्रोध,                                                        देशप्रेम संग,
अबतक हम क्या सोच रहे थे, किस भ्रम में घर बैठ रहे थे l।                                                                               वो सत्य-विजय का एक आगाज थी,जन-उपवन जंग छेड चुकी थी,शत्रु खेमा जो भयभीत हुआ था,बाई तो एक शुरुवात मात्र है,
अधूरे जंग की न सब आस है,
असहाय हो वो सोच रहे थे, क्या मजे का जीवन जी रहे थे,                                कौन बैठा हट को ठान, मांग रहा क्या वो अभय दान, नीति-रीति न कोई मार्ग था,
सत्य की हठ का क्या जवाब था,           
                                 विजय उसी दिन ही हो चुकी थी,मृत्यु द्वार से लौट चुकी थी,भारत भूमि के ज्येष्ठ राज्य में,जय-जयकार,ध्वनि गूज रही थी l।
ये जीत सत्य की आगाज थी, रणभूमि में जंग शुरू हुई थी, बढे चलो हे शौर्यवान, कुछ यूहीं करो भारती का मान,  सेवा जितनी भी कर सकता हूँ,लेखनी पुष्प से अर्पित करता हूँ ll

मृदुल चंद्र श्रीवास्तव                                            




"चल सको तो चलो"

चलो साथी जरा हाथ बढ़ाओ, कुछ ही कदम चलो पर साथ आ जाओ,
क्या पता कौन जाने ये सफर दूर तक चल पड़े,
गम न होगा, फिर न शिकवा न शिकायत होगी,                                                                                             दूर तक न सही, पर संग तो चलें,

जो डर हो कि डगर पर डगमगा जाऊंगा मैं,
भूल ही समझ लो पर लाज न गवाऊंगा मैं,              
जुनून है जज्बा भी और जिगर भी रखता हूँ,जो कर सको यकी तो ये धूल झाड़ता हूँ,
जानता हूँ ये काम आसान न होगा,पर जो लड़ना ही है तो कोई भान न होगा,  
छोड़ दो फ़िक्र सारी, तो इतना करो यकीन,
चंद्रगुप्त नही मैं,न दिखा पाउँगा सीना चीर,

सिधान्तो की क़ीमत पर , समझौते नहीं कर पाता हूँ,                                                                                     हार हो या के जीत,परिणाम को मुकाम तक पहुचाता हूँ,                                                                    हार भी स्वीकार,जीत का सत्कार,पर बीच राह से लौट नहीं पता हूँ,         
  सिधान्तो की कीमत पर समझौते नहीं कर पाता हूँ l


मृदुल चंद्र श्रीवास्तव


Tuesday, November 15, 2016

पाक पर भ्रस्टाचार पर या आवाम पर ?

सर्जिकल स्ट्राइक 2 - पाक पर,भ्रस्टाचार पर या आवाम पर ?


November 14, 2016 [Written By] : Mridul Chandra Srivastava

Image

भक्त, भक्ति, विरोध और समर्थन, अंध समर्थन और अंध विरोध, ये ऐसी दशाएं है जहां व्यक्ति की बुद्धि किसी ख़ास विचार धारा के वशीभूत हो कर भ्रष्ट हो जाती है, फिर उसे सड़क किनारे बहता पानी भी गंगा सामान ही प्रतीत होता है, और गंगा मैली दिखने लगे तो आश्चर्य ही क्या ?यह दशा बिल्कुल उस अफीम के नशे की तरह होती है जो यथार्थ को देखने समझने ही नही देती, और व्यक्ति ख्वाबो में, खयालों में खुश रहता है,और वही जीता है,जबकि असल स्थिति,यथार्थ बहुत भिन्न, कुरूप और समस्याओं में उलझा हुआ होता है l 

फिल हाल अन्य समस्याओं के विषय में बात करने का यह समय उचित नही है इस समय मुह बाए विकराल खड़ी उस समस्या की प्रकृति,स्वरुप,प्रभाव को देख कर निष्पक्ष निर्णय,मूल्यांकन करने की आवश्यकता अधिक मालूम होती है,500 और 1000 क नोटों के #विमुद्रिकरण की स्थिति-परिस्थिति और परिणामो की संभावनाओं पर कल, मेरे द्वारा पस्तुत लेख से परिस्थिति की गंभीर जटिलता को  सरलता पूर्वक समझा जा सकता हैं,वहां भी ऐसी परिस्थिति के विषय में चर्चा की गई है, और वर्तमान संकट की संभावना भी व्यक्त की गई है l इस बात को वही से आगे बढ़ाना चाहूंगा l


ये रोते विलखते लोग कौन है ? क्या इन्ही के हाथों में वो 500 और 1000 वाली वही काली कमाई की गड्डियां हैं जिनके विरुद्ध विमुद्रिकरण का निर्णय लिया गया है ? अंतरात्मा की आवाज सच होती है और वही आत्मा मुझे निष्पक्ष रूप से सत्य को सामने लाने के लिए तब तक कचोटती है जब तक इस पर अपनी बात न रख दूं , आप पाठको के मन में भी यह खीज उठती है तो तैयार रहें यदि सत्य के साथ हैं तो अन्य किसी भी साथ की अपेक्षा न करें, हाँ तिरस्कार, द्वेष और घृणा आप को पुरस्कार स्वरुप अवश्य मिलेगी , और ये पुरस्कार देने वाला कोई और नही आप की और मेरी तरह एक आम जन ही होता है जो या तो भक्ति, या विरोध या फिर अंध समर्थन के लिए बाहे चढाये रहता है, उनसे आग्रह है भक्त या विरोधी नही नागररिक बने विषय वस्तु का निष्पक्ष भाव से मूल्यांकन करे,प्रकट न करे किन्तु भ्रम में न जियें, इसके दुष्परिणामो को कल भी आवाम ने भुगत था और आज भी भुगत ही रही है l


अपनी रोजी रोटी छोड़ कर बैंको पर मथ्था टिकाये और कूल्हे जमाये ये लोग कौन हैं ? ये भ्र्ष्टाचार में लिप्त होते, और काले धन के स्वामी होते तो मुझे विश्वास है इन्हें ऐसा दिन न देखना पड़ता l आप ने रासन के लिए, पानी के लिए, मिटटी के तेल के लिए सरकारी दफ्तरों अथवा बैंको में अपने काम के लिए दिन कितनी ही बार ऐसा समय आ ही जाता है,जब इस प्रकार की परिस्थिति में आप लंबी लाइनों में पंक्तिपद्ध खड़े होते हैं, फिर इस प्रश्न पर आज ही एक राष्ट्रीय चैनल के प्रबुद्ध व्यक्ति ( पत्रकार या फिर जनर्लिस्ट नही, क्योंकि वे ऐसी राय नही देंगे ) कहते है कि "जब फिल्म के टिकटो के लिये, प्रदर्शनी पार्को आदि में जाने के लिए लाइन में लगते है, तब तकलीफ नहीं होती ? आज देश के लिए कुछ अच्छा करने के लिए लाइन में खड़े हैं तो बड़ी पीड़ा हो रही ?" ये महाभक्तवादी व्यक्ति की ही सोच हो सकती है जनर्लिस्ट अथवा निष्पक्ष व्यक्ति कदाचित ऐसा नही सोचेगा l

फिल्म थियेटर के खुशनुमा माहौल के लिए जाते अथवा लाइन में खड़े लोगो में बीमार अथवा वृद्ध, रोजी रोटी छोड़ कर रोते बिलखते परेशान पंक्तिपद्ध खड़े लोगो में कोई भेद इन्हें नही दिखता, इनके अनुसार फिल्म के लिए घण्टे दो घण्टे लाइन में लगने और ये वीडियो में दिख रहे रोते बिलखते सुबह से शाम तक खड़े लोगो में कोई भेद नही है l

अर्थात यदि कल को रोटी के लिए लाइन लगानी हो तो क्या नही लगाएंगे ?


अजी साहेब लगाएंगे, भूखे तो नही मरेंगे न भले ही फिल्म के लिए लाइन लगाएं न लगाएं किन्तु रोटी के लिए तो रोते बिलखते सुबह से शाम तक खड़े रहेंगे ही दूसरा मार्ग ही कहां ? 

यदि ये मेरी बात सुने अथवा पढ़ें तो इन्हें ज्ञात हो कि देश में ऐसे भी स्थान है, जहां जाने के लिए लाइन नही लगनी होती और पूरी सरकारी सुविधा के साथ पहुचाया और खिलाया पिलाया देख भाल किया जाता है , सुबह के चने से लेकर सन्ध्या काल की रोटी तक सब उपलध होती है, आप तो बेहतर जानते होंगे मुझसे श्रेष्ठ और सम्मानप्राप्त, अनुभवी व्यक्ति हैं आप , वैसे मुझे इस बारे में तब पता चला जब अन्ना जी के आंदोलन के समय इस प्रकार की खातिरदारी का सौभाग्य मिला, खैर, 


बात काले धन की करें तो अभी तक कितने काले धन बरामद हुए यह बताना सरकार का दायित्व समझता हूँ, मैं सरकार के इस फैसले का विरोध नही करता बस आम जन की ऐसी दुर्दशा की कीमत पर  स्वम की पीठ स्वयं थपथपाने जैसे कितने तत्व हैं ? यह स्पस्ट किया जाना चाहिए, काला धन न हमने कमाया और न ही जुटाया या फिर न ही तड़ीपार पहुंचाया, किन्तु गेहूं पिस रहा या नही ? घुन अवश्य पिस रहा है ,इस बात का ठीक प्रकार से मूल्यांकन हो तथ्य सामने रखने चाहिए l कल के लेख में बैंको में सरकारी बाबुओं के कटु व्यवहार पर प्रश्न खड़ा किये थेे किन्तु आज खेद जताता हूँ क्योंकि यह समय ऐसी बातों का नही था, आज ऐसे कमर्चारियों की व्यथा से भी साक्षात्कार हुआ, कोई #ICU में है तो कोई अवसाद या उच्च रक्तचाप का शिकार होने पर भी ड्यूटी बजा रहा, इनकी यह हालत गजोधर चाचा ने की है या फिर बलवंत कुमार ने ?

ये प्रश्न भी अपनी जगह है, मेरी पूरी संवेदना आप सरकारी कर्मचारियों के प्रति है, जो इस स्थिति का सीधा सामना कर रहे और इसके पीछे के नकारात्मकता के आघात को शाहस पूर्वक झेल रहे, ससम्मान, अभिनंदन करता हूँ आप जैसे कर्मचारियों का फिर वो RBI में कार्यरत हो या फिर किसी बैंक की छोटी, मोटी साखा में, कम से कम ऐसी परिस्थिति में न्याय यही कहता है, कि कल की टिप्पड़ी अनुचित थी न्याय हों, फिर जनता के साथ मित्र या शत्रु के साथ न्याय बहुत ही आवश्यक है, ये और बात है कि जनता के साथ न्याय हो या अन्याय उसे तो आदत सी हो चली है l  

                

                     न्याय हो

निर्माण हो उत्तपत्ति हो,उत्थान या पतन कोई,


                 उत्कर्ष हो पराभव  या प्रतिकार हो,


लोक हो परलोक हो,सत्य हो या असत्य हो


          पुरष्कार हो दंड हो, विजय हो या हार हो,


प्रेम या विध्वेश हो, सत्कार हो या अपमान हो,


ब्रह्म हो या काल हो, नर हो या देव हो,


                      जननी कोई, जनक या मित्र हो


       शत्रु हो,या मित्र कोई, सगा या पराया सही,


जो भी हो आज हो या भविष्य हो,बस न्याय हो,                          न्याय हो और न्याय हो ll


सर्जिकल स्ट्राइक - 2, भारत, काला धन, नोंटबन्दी,
http://https://youtu.be/kGY72O