Tuesday, November 15, 2016

पाक पर भ्रस्टाचार पर या आवाम पर ?

सर्जिकल स्ट्राइक 2 - पाक पर,भ्रस्टाचार पर या आवाम पर ?


November 14, 2016 [Written By] : Mridul Chandra Srivastava

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भक्त, भक्ति, विरोध और समर्थन, अंध समर्थन और अंध विरोध, ये ऐसी दशाएं है जहां व्यक्ति की बुद्धि किसी ख़ास विचार धारा के वशीभूत हो कर भ्रष्ट हो जाती है, फिर उसे सड़क किनारे बहता पानी भी गंगा सामान ही प्रतीत होता है, और गंगा मैली दिखने लगे तो आश्चर्य ही क्या ?यह दशा बिल्कुल उस अफीम के नशे की तरह होती है जो यथार्थ को देखने समझने ही नही देती, और व्यक्ति ख्वाबो में, खयालों में खुश रहता है,और वही जीता है,जबकि असल स्थिति,यथार्थ बहुत भिन्न, कुरूप और समस्याओं में उलझा हुआ होता है l 

फिल हाल अन्य समस्याओं के विषय में बात करने का यह समय उचित नही है इस समय मुह बाए विकराल खड़ी उस समस्या की प्रकृति,स्वरुप,प्रभाव को देख कर निष्पक्ष निर्णय,मूल्यांकन करने की आवश्यकता अधिक मालूम होती है,500 और 1000 क नोटों के #विमुद्रिकरण की स्थिति-परिस्थिति और परिणामो की संभावनाओं पर कल, मेरे द्वारा पस्तुत लेख से परिस्थिति की गंभीर जटिलता को  सरलता पूर्वक समझा जा सकता हैं,वहां भी ऐसी परिस्थिति के विषय में चर्चा की गई है, और वर्तमान संकट की संभावना भी व्यक्त की गई है l इस बात को वही से आगे बढ़ाना चाहूंगा l


ये रोते विलखते लोग कौन है ? क्या इन्ही के हाथों में वो 500 और 1000 वाली वही काली कमाई की गड्डियां हैं जिनके विरुद्ध विमुद्रिकरण का निर्णय लिया गया है ? अंतरात्मा की आवाज सच होती है और वही आत्मा मुझे निष्पक्ष रूप से सत्य को सामने लाने के लिए तब तक कचोटती है जब तक इस पर अपनी बात न रख दूं , आप पाठको के मन में भी यह खीज उठती है तो तैयार रहें यदि सत्य के साथ हैं तो अन्य किसी भी साथ की अपेक्षा न करें, हाँ तिरस्कार, द्वेष और घृणा आप को पुरस्कार स्वरुप अवश्य मिलेगी , और ये पुरस्कार देने वाला कोई और नही आप की और मेरी तरह एक आम जन ही होता है जो या तो भक्ति, या विरोध या फिर अंध समर्थन के लिए बाहे चढाये रहता है, उनसे आग्रह है भक्त या विरोधी नही नागररिक बने विषय वस्तु का निष्पक्ष भाव से मूल्यांकन करे,प्रकट न करे किन्तु भ्रम में न जियें, इसके दुष्परिणामो को कल भी आवाम ने भुगत था और आज भी भुगत ही रही है l


अपनी रोजी रोटी छोड़ कर बैंको पर मथ्था टिकाये और कूल्हे जमाये ये लोग कौन हैं ? ये भ्र्ष्टाचार में लिप्त होते, और काले धन के स्वामी होते तो मुझे विश्वास है इन्हें ऐसा दिन न देखना पड़ता l आप ने रासन के लिए, पानी के लिए, मिटटी के तेल के लिए सरकारी दफ्तरों अथवा बैंको में अपने काम के लिए दिन कितनी ही बार ऐसा समय आ ही जाता है,जब इस प्रकार की परिस्थिति में आप लंबी लाइनों में पंक्तिपद्ध खड़े होते हैं, फिर इस प्रश्न पर आज ही एक राष्ट्रीय चैनल के प्रबुद्ध व्यक्ति ( पत्रकार या फिर जनर्लिस्ट नही, क्योंकि वे ऐसी राय नही देंगे ) कहते है कि "जब फिल्म के टिकटो के लिये, प्रदर्शनी पार्को आदि में जाने के लिए लाइन में लगते है, तब तकलीफ नहीं होती ? आज देश के लिए कुछ अच्छा करने के लिए लाइन में खड़े हैं तो बड़ी पीड़ा हो रही ?" ये महाभक्तवादी व्यक्ति की ही सोच हो सकती है जनर्लिस्ट अथवा निष्पक्ष व्यक्ति कदाचित ऐसा नही सोचेगा l

फिल्म थियेटर के खुशनुमा माहौल के लिए जाते अथवा लाइन में खड़े लोगो में बीमार अथवा वृद्ध, रोजी रोटी छोड़ कर रोते बिलखते परेशान पंक्तिपद्ध खड़े लोगो में कोई भेद इन्हें नही दिखता, इनके अनुसार फिल्म के लिए घण्टे दो घण्टे लाइन में लगने और ये वीडियो में दिख रहे रोते बिलखते सुबह से शाम तक खड़े लोगो में कोई भेद नही है l

अर्थात यदि कल को रोटी के लिए लाइन लगानी हो तो क्या नही लगाएंगे ?


अजी साहेब लगाएंगे, भूखे तो नही मरेंगे न भले ही फिल्म के लिए लाइन लगाएं न लगाएं किन्तु रोटी के लिए तो रोते बिलखते सुबह से शाम तक खड़े रहेंगे ही दूसरा मार्ग ही कहां ? 

यदि ये मेरी बात सुने अथवा पढ़ें तो इन्हें ज्ञात हो कि देश में ऐसे भी स्थान है, जहां जाने के लिए लाइन नही लगनी होती और पूरी सरकारी सुविधा के साथ पहुचाया और खिलाया पिलाया देख भाल किया जाता है , सुबह के चने से लेकर सन्ध्या काल की रोटी तक सब उपलध होती है, आप तो बेहतर जानते होंगे मुझसे श्रेष्ठ और सम्मानप्राप्त, अनुभवी व्यक्ति हैं आप , वैसे मुझे इस बारे में तब पता चला जब अन्ना जी के आंदोलन के समय इस प्रकार की खातिरदारी का सौभाग्य मिला, खैर, 


बात काले धन की करें तो अभी तक कितने काले धन बरामद हुए यह बताना सरकार का दायित्व समझता हूँ, मैं सरकार के इस फैसले का विरोध नही करता बस आम जन की ऐसी दुर्दशा की कीमत पर  स्वम की पीठ स्वयं थपथपाने जैसे कितने तत्व हैं ? यह स्पस्ट किया जाना चाहिए, काला धन न हमने कमाया और न ही जुटाया या फिर न ही तड़ीपार पहुंचाया, किन्तु गेहूं पिस रहा या नही ? घुन अवश्य पिस रहा है ,इस बात का ठीक प्रकार से मूल्यांकन हो तथ्य सामने रखने चाहिए l कल के लेख में बैंको में सरकारी बाबुओं के कटु व्यवहार पर प्रश्न खड़ा किये थेे किन्तु आज खेद जताता हूँ क्योंकि यह समय ऐसी बातों का नही था, आज ऐसे कमर्चारियों की व्यथा से भी साक्षात्कार हुआ, कोई #ICU में है तो कोई अवसाद या उच्च रक्तचाप का शिकार होने पर भी ड्यूटी बजा रहा, इनकी यह हालत गजोधर चाचा ने की है या फिर बलवंत कुमार ने ?

ये प्रश्न भी अपनी जगह है, मेरी पूरी संवेदना आप सरकारी कर्मचारियों के प्रति है, जो इस स्थिति का सीधा सामना कर रहे और इसके पीछे के नकारात्मकता के आघात को शाहस पूर्वक झेल रहे, ससम्मान, अभिनंदन करता हूँ आप जैसे कर्मचारियों का फिर वो RBI में कार्यरत हो या फिर किसी बैंक की छोटी, मोटी साखा में, कम से कम ऐसी परिस्थिति में न्याय यही कहता है, कि कल की टिप्पड़ी अनुचित थी न्याय हों, फिर जनता के साथ मित्र या शत्रु के साथ न्याय बहुत ही आवश्यक है, ये और बात है कि जनता के साथ न्याय हो या अन्याय उसे तो आदत सी हो चली है l  

                

                     न्याय हो

निर्माण हो उत्तपत्ति हो,उत्थान या पतन कोई,


                 उत्कर्ष हो पराभव  या प्रतिकार हो,


लोक हो परलोक हो,सत्य हो या असत्य हो


          पुरष्कार हो दंड हो, विजय हो या हार हो,


प्रेम या विध्वेश हो, सत्कार हो या अपमान हो,


ब्रह्म हो या काल हो, नर हो या देव हो,


                      जननी कोई, जनक या मित्र हो


       शत्रु हो,या मित्र कोई, सगा या पराया सही,


जो भी हो आज हो या भविष्य हो,बस न्याय हो,                          न्याय हो और न्याय हो ll


सर्जिकल स्ट्राइक - 2, भारत, काला धन, नोंटबन्दी,
http://https://youtu.be/kGY72O


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