Sunday, November 20, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक

हाथ खोल दो सेना के, कश्मीर क्या लाहौर भी गैर न होगा, जिस
घर भी तिरंगा न सजे, उसका खैर न होगा ll
भरने दो हुंकार इन्हें , मातृभूमि के अभिमान है वे,
बजने दो मृदंग, कर दो संखनाद ये
भारत भूमि का तिलक करो, नये अध्याय का प्रारम्भ करो,
दो एक कड़ा सन्देश उन्हें, जीने दें और प्रेम से जीना सीखलें,
आतंक के विनाश का प्रारम्भ करे, ये के अपने विनाश के दिन गिनना 😊llआरम्भ करें ll😊                  
  
                           


स्वप्न लोक

मेरा क्या में तो वैराग्य लिए वैरागी हो जाऊं,
आँखें झपकूँ तो बुद्ध ,महावीर और कृष्ण भी कहलाऊँ,
यही सोच कर खुश हो लेता हूँ, 1 के बदले 100 की कसम में फिर लेता हूँ,
संग चलो स्वप्न लोक के , वो धन भी तुम्हें दिखलाता हूँ,
कल भी बोला था, फिर वही बात दुहराता हूँ,
चलो फिर, स्वप्न लोक में, उन्हीं नैनों की ओट में, कहो तो मैं फिर वो पम्पलेट छपवाता हूँ,                                                                                                1 के बदले 100 की कसम में फिर दुहराता हूँ,
चलो स्वप्न लोक में वो धन तुम्हें दिखलाता हूँ ll                       



!! हे मानव !!

भूमिका ~
हाल में ही एक व्यक्ति (मांझी) ने अपनी पत्नी की मृत्यु के पश्चात अस्पताल से उसके मृत शरीर को कंधें पर लादे घर को निकल पडे, क्योंकि इस काम के लिए अस्पताल प्रशासन के पास तत्काल कोई सुविधा उपलब्ध नही थी,अब ऐसे घड़ी में जब उसके ऊपर ऐसा संकट हो, क्या अपेक्षा की जा सकती है कि व्याकुल और बदहवासी में व्यक्ति सही निर्णय लेगा ? नही की जा सकती, ऐसे में दायित्व अस्पताल प्रशासन का ही होता है, पूरे देश से, एक भी मदत की पेशकश नही आई जबकि पाक में आतंकी हमले में मरे लोग  को मुद्राएं दान करने वाले लोग दिख जाते थे, फिर इस बारी क्या पता ?
एक विदेशी राजनयिक ने उसके परिवार, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सहयोग की पेशकश की जिसे जरूयत मंद, माझी ने स्वीकार भी किया l

ददलानी ने एक भद्र धार्मिक, सरल व्यक्ति पर ट्वीटर के माध्यम से आपत्ति जनक शब्द व चित्र साझा किए, निश्चय ही धर्मिक स्वतंत्रता और निजता उन्हें ये अधिकार देती है, ददलानी कुंठित हुए इस बात को भूल जाते है और फिर पूरे देश में धर्मयोगियो की धार्मिक भावनाएं आहत हो गईं l उत्तर प्रदेश के शामली/बुलंदशहर, नामक शहरो से दुराचार की विभत्स घटना प्रकाश में आती है, किन्तु इस बात पर यही धर्मवीर खामोश रह जाते हैंl

"धर्म मनुष्य के उत्तम जीवन जीने के लिए दिशा निर्देश है पर विडम्बना है कि धर्म के समक्ष इंसानियत की कोई कीमत ही शेष नही रहा ll



~ रचना ~

क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,कही स्वयं ही मृत हो, तो कही मृत की हड्डियां भी तोड़ देते हो,
मृत/परिवार को जो न दे सको संवेदना, पर भूल न जाओ वो दर्द, वो वेदना,
हे मानव,                                     क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
सड़क पर चोटिल,लहूलुहान व्यक्ति के दुःख तो न हर लोगो !                                                                        पर उसे तड़पता देख मुख जरूर मोड़ लोगे,
धार्मिक हो पूजा पाठ करते हो, करो आराधना,                                                                                           पर तुम क्यों नहीं कर पाते हो सत्य का सामना,
हे मानव,
क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
कहीं स्वयं मृत हो तो कही मृतक की हड्डियां भी तोड़ देते हो,
कमी है देश में किस बात की वो बस, हाथ फेर दशा न बदल दें गरीबो की,
फिर क्यों विदेशों से भीख की पेशकश होने देते हो,
बताओ मुझे ददलानी पर शर्मिंदा हो, तो यहां मुख क्यों मोड़ लेते हो,
पैसे के लिए खुद्दारी की कीमत नही चुकाते हम,
मुह मोड़ लो तो क्या पर इस दुर्दशा के जिम्मेदार है हम,
हे मानव,                                                                                                         
क्यों स्वयं के ही अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
कही खुद मित्र हो कही मृतक की हड्डियां तोड़ देते हो,
निर्भया, दामिनी, शामली इनके भी गुनहगार हैं हम,
पर देखो कहीं धर्म की हो न जाय खोटी,खींच लोगे तलवारें और बहादोगे तुम खून,
कभी सोचा है जो बह गया सडको पर,वो कितनी बड़ी थी भूल l  
इस बात पर कब होंगे शर्मिन्दा,कब एक जुट हो करोगे तुम इसकी निंदा,
कब उठाओगे कर्तव्य - कर्म का भार,
कब करोगे ऐसे रावणो पे वार,     
हे मानव,                                                               क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,                                                                                               कही स्वयं मृत हो तो कहीं मृतक की हड्डियां तोड़ देते हो,                                                                        कुछ कर्म है, कुछ धर्म भी, जीव से ही सत्कर्म भी,
फिर क्यों नही करते खुल कर इसकी निंदा, क्यों करते हो तुम इंसानियत को शर्मिंदा

मृदुल चंद्र श्रीवास्तव                     







       अन्ना-आंदोलन

 आंदोलन कहो या कहो तुम जीवन,जो चाहो दे लो नाम,चाहो तो कर लो अप-मान,पर सुनो, थी वो सत्य का ही ललकार, देखो झूठ पर जो किया प्रहार,वर्षो के उस अंध तंत्र को,भारत भूमि के नन्द वंश को,                                   खोली उसने कब वो चोटी, बस पहन एक संत की  टोपी,देखो कैसा आगाज हुआ था, स्तब्ध नन्द समाज हुआ था,
भारत भूमि के उस अन्धकार को,अहंकार के असत्य मॉन को फौलाद खडा जो घूर रहा था अकेले हर चुनौती क़ुबूल रहा था,गुरु आशीष लेे लिया उपवास,                                                                             हठ योगी हठ को ठान,धरती हिली, भयभीत काल भी,
देखो वो कैसा अनुष्ठान हुआ था, कण-कण देशप्रेम और गुलजार हुआ था,   
                                                                                               राज्य-नीति को जो कोस रहे थे,वो हैरत में सोच रहे थे,वेशभूषा का कैसा उपवन,
मुख पे क्रोध,                                                        देशप्रेम संग,
अबतक हम क्या सोच रहे थे, किस भ्रम में घर बैठ रहे थे l।                                                                               वो सत्य-विजय का एक आगाज थी,जन-उपवन जंग छेड चुकी थी,शत्रु खेमा जो भयभीत हुआ था,बाई तो एक शुरुवात मात्र है,
अधूरे जंग की न सब आस है,
असहाय हो वो सोच रहे थे, क्या मजे का जीवन जी रहे थे,                                कौन बैठा हट को ठान, मांग रहा क्या वो अभय दान, नीति-रीति न कोई मार्ग था,
सत्य की हठ का क्या जवाब था,           
                                 विजय उसी दिन ही हो चुकी थी,मृत्यु द्वार से लौट चुकी थी,भारत भूमि के ज्येष्ठ राज्य में,जय-जयकार,ध्वनि गूज रही थी l।
ये जीत सत्य की आगाज थी, रणभूमि में जंग शुरू हुई थी, बढे चलो हे शौर्यवान, कुछ यूहीं करो भारती का मान,  सेवा जितनी भी कर सकता हूँ,लेखनी पुष्प से अर्पित करता हूँ ll

मृदुल चंद्र श्रीवास्तव                                            




"चल सको तो चलो"

चलो साथी जरा हाथ बढ़ाओ, कुछ ही कदम चलो पर साथ आ जाओ,
क्या पता कौन जाने ये सफर दूर तक चल पड़े,
गम न होगा, फिर न शिकवा न शिकायत होगी,                                                                                             दूर तक न सही, पर संग तो चलें,

जो डर हो कि डगर पर डगमगा जाऊंगा मैं,
भूल ही समझ लो पर लाज न गवाऊंगा मैं,              
जुनून है जज्बा भी और जिगर भी रखता हूँ,जो कर सको यकी तो ये धूल झाड़ता हूँ,
जानता हूँ ये काम आसान न होगा,पर जो लड़ना ही है तो कोई भान न होगा,  
छोड़ दो फ़िक्र सारी, तो इतना करो यकीन,
चंद्रगुप्त नही मैं,न दिखा पाउँगा सीना चीर,

सिधान्तो की क़ीमत पर , समझौते नहीं कर पाता हूँ,                                                                                     हार हो या के जीत,परिणाम को मुकाम तक पहुचाता हूँ,                                                                    हार भी स्वीकार,जीत का सत्कार,पर बीच राह से लौट नहीं पता हूँ,         
  सिधान्तो की कीमत पर समझौते नहीं कर पाता हूँ l


मृदुल चंद्र श्रीवास्तव


Tuesday, November 15, 2016

पाक पर भ्रस्टाचार पर या आवाम पर ?

सर्जिकल स्ट्राइक 2 - पाक पर,भ्रस्टाचार पर या आवाम पर ?


November 14, 2016 [Written By] : Mridul Chandra Srivastava

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भक्त, भक्ति, विरोध और समर्थन, अंध समर्थन और अंध विरोध, ये ऐसी दशाएं है जहां व्यक्ति की बुद्धि किसी ख़ास विचार धारा के वशीभूत हो कर भ्रष्ट हो जाती है, फिर उसे सड़क किनारे बहता पानी भी गंगा सामान ही प्रतीत होता है, और गंगा मैली दिखने लगे तो आश्चर्य ही क्या ?यह दशा बिल्कुल उस अफीम के नशे की तरह होती है जो यथार्थ को देखने समझने ही नही देती, और व्यक्ति ख्वाबो में, खयालों में खुश रहता है,और वही जीता है,जबकि असल स्थिति,यथार्थ बहुत भिन्न, कुरूप और समस्याओं में उलझा हुआ होता है l 

फिल हाल अन्य समस्याओं के विषय में बात करने का यह समय उचित नही है इस समय मुह बाए विकराल खड़ी उस समस्या की प्रकृति,स्वरुप,प्रभाव को देख कर निष्पक्ष निर्णय,मूल्यांकन करने की आवश्यकता अधिक मालूम होती है,500 और 1000 क नोटों के #विमुद्रिकरण की स्थिति-परिस्थिति और परिणामो की संभावनाओं पर कल, मेरे द्वारा पस्तुत लेख से परिस्थिति की गंभीर जटिलता को  सरलता पूर्वक समझा जा सकता हैं,वहां भी ऐसी परिस्थिति के विषय में चर्चा की गई है, और वर्तमान संकट की संभावना भी व्यक्त की गई है l इस बात को वही से आगे बढ़ाना चाहूंगा l


ये रोते विलखते लोग कौन है ? क्या इन्ही के हाथों में वो 500 और 1000 वाली वही काली कमाई की गड्डियां हैं जिनके विरुद्ध विमुद्रिकरण का निर्णय लिया गया है ? अंतरात्मा की आवाज सच होती है और वही आत्मा मुझे निष्पक्ष रूप से सत्य को सामने लाने के लिए तब तक कचोटती है जब तक इस पर अपनी बात न रख दूं , आप पाठको के मन में भी यह खीज उठती है तो तैयार रहें यदि सत्य के साथ हैं तो अन्य किसी भी साथ की अपेक्षा न करें, हाँ तिरस्कार, द्वेष और घृणा आप को पुरस्कार स्वरुप अवश्य मिलेगी , और ये पुरस्कार देने वाला कोई और नही आप की और मेरी तरह एक आम जन ही होता है जो या तो भक्ति, या विरोध या फिर अंध समर्थन के लिए बाहे चढाये रहता है, उनसे आग्रह है भक्त या विरोधी नही नागररिक बने विषय वस्तु का निष्पक्ष भाव से मूल्यांकन करे,प्रकट न करे किन्तु भ्रम में न जियें, इसके दुष्परिणामो को कल भी आवाम ने भुगत था और आज भी भुगत ही रही है l


अपनी रोजी रोटी छोड़ कर बैंको पर मथ्था टिकाये और कूल्हे जमाये ये लोग कौन हैं ? ये भ्र्ष्टाचार में लिप्त होते, और काले धन के स्वामी होते तो मुझे विश्वास है इन्हें ऐसा दिन न देखना पड़ता l आप ने रासन के लिए, पानी के लिए, मिटटी के तेल के लिए सरकारी दफ्तरों अथवा बैंको में अपने काम के लिए दिन कितनी ही बार ऐसा समय आ ही जाता है,जब इस प्रकार की परिस्थिति में आप लंबी लाइनों में पंक्तिपद्ध खड़े होते हैं, फिर इस प्रश्न पर आज ही एक राष्ट्रीय चैनल के प्रबुद्ध व्यक्ति ( पत्रकार या फिर जनर्लिस्ट नही, क्योंकि वे ऐसी राय नही देंगे ) कहते है कि "जब फिल्म के टिकटो के लिये, प्रदर्शनी पार्को आदि में जाने के लिए लाइन में लगते है, तब तकलीफ नहीं होती ? आज देश के लिए कुछ अच्छा करने के लिए लाइन में खड़े हैं तो बड़ी पीड़ा हो रही ?" ये महाभक्तवादी व्यक्ति की ही सोच हो सकती है जनर्लिस्ट अथवा निष्पक्ष व्यक्ति कदाचित ऐसा नही सोचेगा l

फिल्म थियेटर के खुशनुमा माहौल के लिए जाते अथवा लाइन में खड़े लोगो में बीमार अथवा वृद्ध, रोजी रोटी छोड़ कर रोते बिलखते परेशान पंक्तिपद्ध खड़े लोगो में कोई भेद इन्हें नही दिखता, इनके अनुसार फिल्म के लिए घण्टे दो घण्टे लाइन में लगने और ये वीडियो में दिख रहे रोते बिलखते सुबह से शाम तक खड़े लोगो में कोई भेद नही है l

अर्थात यदि कल को रोटी के लिए लाइन लगानी हो तो क्या नही लगाएंगे ?


अजी साहेब लगाएंगे, भूखे तो नही मरेंगे न भले ही फिल्म के लिए लाइन लगाएं न लगाएं किन्तु रोटी के लिए तो रोते बिलखते सुबह से शाम तक खड़े रहेंगे ही दूसरा मार्ग ही कहां ? 

यदि ये मेरी बात सुने अथवा पढ़ें तो इन्हें ज्ञात हो कि देश में ऐसे भी स्थान है, जहां जाने के लिए लाइन नही लगनी होती और पूरी सरकारी सुविधा के साथ पहुचाया और खिलाया पिलाया देख भाल किया जाता है , सुबह के चने से लेकर सन्ध्या काल की रोटी तक सब उपलध होती है, आप तो बेहतर जानते होंगे मुझसे श्रेष्ठ और सम्मानप्राप्त, अनुभवी व्यक्ति हैं आप , वैसे मुझे इस बारे में तब पता चला जब अन्ना जी के आंदोलन के समय इस प्रकार की खातिरदारी का सौभाग्य मिला, खैर, 


बात काले धन की करें तो अभी तक कितने काले धन बरामद हुए यह बताना सरकार का दायित्व समझता हूँ, मैं सरकार के इस फैसले का विरोध नही करता बस आम जन की ऐसी दुर्दशा की कीमत पर  स्वम की पीठ स्वयं थपथपाने जैसे कितने तत्व हैं ? यह स्पस्ट किया जाना चाहिए, काला धन न हमने कमाया और न ही जुटाया या फिर न ही तड़ीपार पहुंचाया, किन्तु गेहूं पिस रहा या नही ? घुन अवश्य पिस रहा है ,इस बात का ठीक प्रकार से मूल्यांकन हो तथ्य सामने रखने चाहिए l कल के लेख में बैंको में सरकारी बाबुओं के कटु व्यवहार पर प्रश्न खड़ा किये थेे किन्तु आज खेद जताता हूँ क्योंकि यह समय ऐसी बातों का नही था, आज ऐसे कमर्चारियों की व्यथा से भी साक्षात्कार हुआ, कोई #ICU में है तो कोई अवसाद या उच्च रक्तचाप का शिकार होने पर भी ड्यूटी बजा रहा, इनकी यह हालत गजोधर चाचा ने की है या फिर बलवंत कुमार ने ?

ये प्रश्न भी अपनी जगह है, मेरी पूरी संवेदना आप सरकारी कर्मचारियों के प्रति है, जो इस स्थिति का सीधा सामना कर रहे और इसके पीछे के नकारात्मकता के आघात को शाहस पूर्वक झेल रहे, ससम्मान, अभिनंदन करता हूँ आप जैसे कर्मचारियों का फिर वो RBI में कार्यरत हो या फिर किसी बैंक की छोटी, मोटी साखा में, कम से कम ऐसी परिस्थिति में न्याय यही कहता है, कि कल की टिप्पड़ी अनुचित थी न्याय हों, फिर जनता के साथ मित्र या शत्रु के साथ न्याय बहुत ही आवश्यक है, ये और बात है कि जनता के साथ न्याय हो या अन्याय उसे तो आदत सी हो चली है l  

                

                     न्याय हो

निर्माण हो उत्तपत्ति हो,उत्थान या पतन कोई,


                 उत्कर्ष हो पराभव  या प्रतिकार हो,


लोक हो परलोक हो,सत्य हो या असत्य हो


          पुरष्कार हो दंड हो, विजय हो या हार हो,


प्रेम या विध्वेश हो, सत्कार हो या अपमान हो,


ब्रह्म हो या काल हो, नर हो या देव हो,


                      जननी कोई, जनक या मित्र हो


       शत्रु हो,या मित्र कोई, सगा या पराया सही,


जो भी हो आज हो या भविष्य हो,बस न्याय हो,                          न्याय हो और न्याय हो ll


सर्जिकल स्ट्राइक - 2, भारत, काला धन, नोंटबन्दी,
http://https://youtu.be/kGY72O


Thursday, October 20, 2016

Tum n hi mano

                            सर्जिकल स्ट्रा
तुम न मानो न ही मानो
पर शीश हमारा ही झुकता है,
भारत भूमि से कर रुसवाई,
निर्माण तुम्हारा होता है !
तुम इस भूमि को जनक मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
धर्म जाति को आधार बना,
भारत का सीना चीरा जाता है,
हिन्दुकुश, सिन्धु ,हिंद सागर तक का,
वैभव छीना जाता है,
तुम इस भूमि को जनक मानो तो
शीश हमारा ही झुकता है 1
भारत वैभव के खंड-विखन्ड़ पर,
निर्माण तुम्हारा होता है,
भूखा,नन्गा रह हर किसान तब,
तुम्हारे लिये ही धन जुटाता है,
उस किसान का कर्ज न मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
वसुदेव कुटुम्बकम की परंपरा को,
भूमि के टुकड़ों की कीमत पर,
हस कर निभाया जाता है,
देशी विदेशी हर एक मानुष को,
बगल बिठाया जाता है,
तुम इस माटी का कर्ज मानो तो,
शीश हमारा ही झुकता है 1
मृदुल चंद्र श्रीवास्तव  
माँ भारती के चरणो में
   अर्पित।  

Monday, September 26, 2016

सिंधु जल संधि


सिंधु नदी जल संधि-सही या गलत

निर्णय कितना भी सही हो अथवा कितना भी गलत दोनों में ही सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष होते है,निर्भर इसपे है कि कौन व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह किस प्रकार किसी विन्दु को देखता और समझता है,किन्तु एक बात र्स्वीकार की जनी चाहिए कि सकारात्मक और नकारात्मक बातो में कौन सा अधिक प्रबल और लाभदायी है और उसके लिए नकारात्मकता वाले विंदु को नजरअंदाज किया जाना चाहिए lकिन्तु ये कार्य इतना सरल नहीं क्योंकि मामला अंतरास्ट्रीय भी है और देश के सवा सौ करोण लोगो के हितों से जुड़ा हुआ है l इससे जटिलता और मजबूत हो जाती है ,सम्पूर्ण देश और भूभाग की शुरक्षा का प्रथम दायित्व सरकार का ही है किंतु नागरिक हित सरकारी निर्णयो को प्रभावित करते हैं और यहाँ मामला यही उचित माना जाता है कि यदि एक की कीमत पर सौ के हितों को ऊर्जा मिलती है तो फिर उस एक के हित भी उन्ही सौ से ही जोड़ कर देखे जाते हैं lवर्त्तमान के ज्वलंत मुद्दे की व्याख्या स्वयं के उपलब्ध तथ्यों एवं सोच के हिसाब से की गई है जो कि पूर्णतः व्यक्तिगत हैं अन्य व्यक्तियों एवं सरकार की सोच अलग हो सकती है l मेरा प्रयास बस स्वयं की बात को पटल पर रखना ही है l



सिंधु समझौते  को तोड़ा जा सकता है निश्चय ही तोड़ा जा सकता है,किन्तु किसी भी निष्कर्ष तक पहुचने से पहले हर विंदु पर गहन विचार करना आवश्यक है, सरकार इस बात की गंभीरता को बखूबी समझ रही है,और मुद्दे पर गंभीरता को भी सरकारी निर्णयो में देखा जा सकता है l में प्रयास करूंगा कि दोनों पक्षो को निष्पक्ष भाव से स्पष्ट कर सकूँ l

सिंधु जल संधि को भंग करने के पश्चात कौन - कौन सी परिस्थितियां उत्त्पन्न हो सकती हैं इसका बस अनुमान ही लगाया जा सकता है अतःइसपर में अपने निजी विचार रख रहा,चुकी देश की जिम्मेदारी एक काबिल हाथो में है, इस बात पर मुझे कोई संदेह नहीं, चाहे वो प्रधानमन्त्री हों अथवा सेना प्रमुख या रक्षा मंत्री सभी नेतृत्वकर्ता बेहद अनुभवी एवं अपने अधिकार क्षेत्र के उत्कृष्ट लोग है, ख़ास कर अजीत डोबाल साहेब जिन्हें में वर्त्तमान की विदेश राजनीति का चाणक्य मानता हूँ l


मूल विषय 

सिंधु नदी का उद्गम श्रोत मानसरोवर झील है जो कि कैलास पर्वत (तिब्बत-चीन) के निकट ही है अथवा कहे कि ये झील उसी पर्वत श्रेणी पर है,एक अन्य बात ये है कि भारत की एक सबसे विशाल जल बहाव क्षेत्र वाली नदी ब्रह्मपुत्रा भी इसी मानसरोवर झील से निकलती है,जो भारत के अरुणाचल प्रदेश असम को संचित करती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है l
google.com सिंधु नदी जो मानसरोवर झील से निकल कर उत्तर पश्चिम की और बहती हुई कश्मीर में प्रवेश करती है फिर भारत के कुछ अन्य भागों से होते हुए पाकिस्तान में प्रवेश करती है l

इसके अतिरिक्त मानसरोवर झील से पूर्व की और बहने वाली नदी #ब्रह्मपुत्र ( जिसे चीन में #सांगपो नाम से जाना जाता है ) अरुणाचल प्रदेश से भारत में प्रवेश करती है ,अरुणाचल में इसके दो बहाव क्षेत्र लोहित और दिबांग जहां पर मिलते है वहां से ये नदी ब्रह्मपुत्र कही जाती है और ये क्षेत्र है भारत का असम राज्य जहां ये नदी असम के एक छोर से दुसरे छोर की दूरी तय करते हुए अंत में गंगा से मिलती है और आगे इसे बांग्लादेश में पद्मा कहा जाता है l

ये है इन दो नदियों की भौगोलिक स्थिति जो चीन (तिब्बत) से होकर भारत भूमि में प्रवेश करती है जहां तक सिंधु नदी और पाकिस्तान की बात है तो सिंधु नदी भी पाक के एक छोर से प्रवेश कर दक्षिण के दूसरे छोर से गुजरते हुए अरब सागर में मिल जाती है,ये नदी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है l 
इस नदी की अहमियत की चर्चा प्राचीन ग्रंथों में मिलती है , आर्यो ने वेद और पुराण में इस नदी की प्रशंसा करते हूँए इसे पूज्य स्थान दिया है और लिखा है कि इतनी विशालकाय नदी उन्होंने आज तक नहीं देखी,( सिंधु विश्व की 22वी सबसे बड़ी नदी है एवं एशिया की प्रथम सबसे बड़ी नदी ) मान्यता रही है कि आर्य यूरोप के अल्प्स पर्वत के पास से आये,
(यद्यपि आधुनिक शोधों ने इस तथ्य पर गम्भीर प्रश्न खड़े किये हैं ) 

पाकिस्तान भी एक कृषि प्रधान देश है तो उसकी कृषि में सिंधु नदी और मानसून की प्रमुख भूमिका है और यदि इस नदी के बहाव को पाकिस्तान जाने से रोक लिया गया अथवा बहाव क्षेत्र को किसी अन्य सुरक्षित स्थान की और मोड़ दिया जाय तो निश्चय ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि पर अभूतपूर्व हानि होगी कहा जाय कि ये पाक के कमर तोड़ने वाली रणनीति होगी,तो भी गलत नहीं होगा l सिंधु नदी पुरे पाकिस्तान से होते हुये अरब सागर में गिरती है इस लिए इसके बहाव का पूरा क्षेत्र पाक के महत्वपूर्ण नगरो से हो कर गुजरती है और यदि सिंधु जल संधि रद्द कर दें तो फिर इस नदी के आसपास के बड़े शहर सूखे के शिकार हो जाएगे और इसके साथ बलूच मुद्दे को और जोर शोर से उठाया गया तो पाकिस्तान की हालत न घर के न घाट के जैसी हो जाएगी l 




अब इसके नकारात्मक पक्ष पर गौर करें-

१- अंतरास्ट्रीय मंच पर छवि को नुक्सान होगा जिस प्रकार की छवि भारत की अब तक रही है l

२- पाकिस्तान इस मुद्दे को तूल दे कर अपने लोगो के प्राकृतिक अधिकारों का हनन बता कर विश्व समुदाय की संवेदनाये प्राप्त कर सकता है जिससे अंतरास्ट्रीय झुकाव जो आज भारत की अधिक है,का भी नुकशान उठाना पड़ सकता है l

३- इस प्रकार पुरे विश्व में पाक को आतंकी राष्ट्र घोषित किये जाने की इम्मीदे ख़त्म हो सकती है l

४- सबसे बड़ी बात जो सबसे गंभीर स्थिति ला सकती है कि ऐसा होने के पश्च्यात पाकिस्तान अपने आका चीन की कदमो में सहयोव के लिए पहुचेगा, और मांग करेगा की चीन भी कुछ ऐसा ही निर्णय सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों पर ले जो कि पूर्ण रूप से चीन के अधिकार क्षेत्र है l

४- ये भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि ब्रह्मपुत्र को लेकर भारत और चीन के बीच कोई संधि समझौता नहीं है और न ही किसी अन्य देश से ही ब्रह्मपुत्र पर कोई संधि हो ,ऐसा भी नहीं l

अब यदि इन पक्षो में यदि सत्यता है,जीतनी कि जानकारी मेने जुटाई है,तो इनपर विचार जरूर किया गया होगा l

सरकार निर्भय हो कर कार्यवाही हेतु आगे बढे भारत माँ अब और लाल नहीं खोना चाहती अतः सरकार द्वारा इस मुद्दे पर लिया गया हर निर्णय स्वीकार किया जाना चाहिए एक मत से संगठित हो उसे अंजाम दिया गया तो ये एक और सकारात्मक पक्ष कि स्थिति होगी l


और गौर करें कि सरकार मध्यम मार्ग अपनाना चाहती है जिसके तहत हम संधि तोड़ेंगे नहीं बल्कि कश्मीर में इस नदी का उयोग भारी मात्रा में बिजली उत्पादन के कार्य में उपयोग में लाया जाएगा,और ऐसा हुआ तो शानदार कूटनीति का प्रयोग किया जाएगा ये एक ऐसा निर्णय होगा जोकि पिछली सरकारों ने इतिहास में पहके कभी नहीं लिया l

#blog, #Facebook #राजनीती

-माँ भारती के चरणों में सादर-
    मृदुल चंद्र श्रीवास्तव 

Tuesday, September 20, 2016

पाकिस्तान पर नहीं वामिस्तान पर हो कार्यवाही

! पाकिस्तान पर नहीं वामिस्तान पर हो कार्यवाही !!
वर्त्तमान परिस्थिति में यदि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सूक्ष्म अवलोकन करें तो आप देखेंगे कि देश के लिए आतंकवाद कितना गंभीर विषय बन चुका है l बात केवल अस्मिता के चोटिल होने की नहीं,बल्कि अन्य कई गंभीर पक्ष और भी हैं जो देश के सवा सौ करोण लोगो को परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं,चोटिल और कुंठित करते हैं l ये प्रभाव हम पर साफ़ तौर पर देखा जा सकता है,इसके अतिरिक्त ये कि आतंकवाद का प्रभाव समय के साथ साथ अपने प्रभाव क्षेत्र को ही नहीं अपितु आतंक की गुडवत्ता को भी बढ़ाते जा रहा है ,जो धीमे धीमे बिना कोई शोर गुल किये हमारे बीच पल,बढ़ रहा है,और हमें इसके दुष्प्रभावो का अनुमान ही नहीं लग रहा l
प्रभाव/कारण,
-- सामाजिक नियमो का पतन, आक्रोश,
-- समाज का दो ध्रुवो में विघटन,
-- एक दूसरे के प्रति भय की भावना,
-- आतंक समर्थको का मीडियाकरण,
-- विकास, कल्याण आदि से भटकाव,
-- युवाओ का आतंकियों से संवाद,
-- शोसल मीडिया बेहतर मंच,
-- क़ानून व्यवस्था का भय समाप्त,
-- कुछ राजनेताओ द्वारा तुस्टीकरण,
-- विदेशी मूल से संचालित कुछ लोग,
-- अखण्डता एवं बन्धुता का ह्रास,
-- कुछ तत्वों को स्वलाभ की परम इच्छा,

गौर करने योग्य बात ये है कि उपरोक्त विन्दुओं में समस्या-कारण की बात अपने भौगोलिक क्षेत्र के दायरे में ही की गई है और ये हमारे लिए पहली प्राथमिकता भी है l बुजुर्गो ने कहा है---
बुरा जो देखन में चला...... जो दिल खोजो आपना मुझसे बुरा न कोय l
इसका ये अर्थ नहीं कि आतंक की जड़ हम में है बल्कि भाव यह है कि यदि स्वयं को स्वस्थ रखा जाय तो बीमारिया खुद बाखुद दूर रहती है l
अब देखना ये है कि हमारे भीतर वो कौन से कमजोर बीमार पक्ष है जो कि ऐसे लोगो को बढ़ने का वातावरण बना रहे ?
गौर करे और भाव को समझें -----
हर आतंकी घटना अमानवीय पीड़ा,निर्दयता का ऐसा साक्षात्कार कराती हैं कि एक मध्यम वर्गीय साधारण सी सोच रखने वाले व्यक्ति के भीतर गहरा आक्रोश और खीज उत्पन्न करती है, ध्यान रहे कि इस स्थिति में जो कोई भी व्यक्ति होता है वो अब स्वाभाविक रूप से इस आक्रोश और झुझलाहट से मुक्त होने के लिए, अपनी भड़ास के रूप में इस आक्रोस को बाहर निकालने का यत्न करता है और फिर शोसल मीडिया इस हेतु बिलकुल उपयोगी और उचित स्थान है क्योंकि यहाँ आप की बात का समर्थन किया जाएगा और चर्चा होगी, क्रिया की और भी गंभीर अंदाज में प्रतिक्रया की जाएगी वजह ये है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इससे गुजर रहा होता है l अब धीरे धीरे इस मुद्दे का ज्वार मन में शांत होने लगता है और फिर हम सब भूल भाल कर अगले आतंकी हमले तक शांत हो जाते है l
खैर यहाँ देखना दिलचस्प होगा कि लोगो के आक्रोश के गुबार को अपनी भड़ास को किसके सर फोड़ा जा रहा सरकार एक वजह है , में इससे अलग और तत्वों पर ध्यान लाना चाह रहा l
इस सूची में पाक के बाद कश्मीरी और पुनः अपने अन्य महत्व के भू भाग के लोग जैसे बौद्धिक महाविद्यालय एवं इस आतंक को मूक समर्थन देने वाले कुछ लोग,
आतंक की वजह को खुद के भीतर से निकाल फेकने की बजाय इसका जिम्मेदार अमेरिका और होने वाले घरेलू झगड़ो को बताने वाले चंद संगठित लोग l तर्क को सिरे से खारिज नहीं करता मानता हूँ कश्मीरियो द्वारा सेना के विरोध किये जॉने के पीछे कुछ कारण हो सकते हैं लेकिन फिर वही बात आती है कि सर्वप्रथम अपने भीतर सुधार हो एवं मनगढंत ख़्वाब कुरीतियो कुप्रथाओ को तत्काल दूर किया जाय l
किंतु विडम्बना ये है कि सेकुलरो के झूठे रूप धारण करने वालो और नौनिहाल बौधिक केंद्र के बुद्धिजीवियों को खुद के भीतर कोई वजह नहीं दिखती सारा का सारा दोष सरकार और सेना का है ?
आप को क्या लगता है कि ये लोग इतने भोले हैं कि
दीपावली में पर्यावरण के लिए हो हल्ला करते है किंतु खून की धार घुटनो तक सडको पर बहती इन्हें इकोफ्रेंडली मालूम होती है ?
बुरहान वाणी, अफज़ल,याकूब इनके आदर्श नहीं पर कार्य क्षेत्र के आधार हैं अन्यथा क्या सम्बन्ध है वजह क्या है ? इनकी क्या पीड़ा है ?
सेना स्थानीय निवासियों के साथ दुर्व्यवहार, दुराग्रह का भाव रखती है ये बात इन्हें दिखती है फिर सेना पर अमानवीय कृत्य को अंजाम देने वालो का नाम क्यों नहीं लिया जाता ? ताली कभी भी एक हाथ से नहीं बजती,ये स्वतः मूर्ख है जो इन्हें लगता हो कि वे लोगो को मूर्ख बना लेंगे l कश्मीरी पंडितों की पीड़ा के समय इनकी संवेदनाएं गर्त में क्यों चली जाती है ? यदि आप मानवता को सबसे बड़ा मज़हब मानते है और सच्चे सेकुलर है तो दोनों पक्षो का समालोकन करते l
कैसे सत्य माने आप के इस क्षद्म रूप को कि आप के चिंतन संहिता में कश्मीरियो के हित हैं किंतु आये दिन आतंक का शिकार हो रही सेना आप को नहीं दिखती और दिखी भी तो इस पर जश्न मनाएंगे l
छुपा क्या और बचा क्या जो अब भी देश में बैठ कर सेकुलर कहे जाने वाले इस मूर्खता का समर्थन करें l
वो "पत्रकार" जो हर आतंकी पर कार्यवाही किये जाने के बाद बेवा हो जाने जैसी प्रतिक्रिया दे तो फिर आज जब 18 सैनिको को भून दिया गया तो इन्हें क्यों साँप सूंघ गया है ? ऐसे लोगो को शिक्षण संस्थानों को शिक्षा के मंदिर कहे जाने पर तो आपत्ति होती है किंतु जब बुरहान वाणी की मृत्यु के बाद मृतक पिता उसे जन्नत नसीब होने की बात करता है तो इस पर ये क्यों चुप रहते है ?
यदि इन प्रश्नों का दो पंक्ति में उत्तर दू तो ये बस मामूली प्यान्दे है जिसका रिमोट कंट्रोल विदेशो से संचालित होता है l ये उन्ही की फेकि रोटियों पर जिंदा हैं , इसलिये उनपर कार्यवाही करने से कोई बेवा हो जाता ह तो कोई अनाथ l
कार्यवाही का श्री गणेश ---
जी बिल्कुल, निःशंकोच बेवाक त्वरित कार्यवाही हो ऐसे तत्व जहां कही भी हो उन पर कड़ी नजर रखी जाए एवं शोसल मिडिया पर आये दिन पाक को पैतृक संपत्ति बताने वाले लोगो की गंभीरता से खबर ली जाय,ये छोटी घटनाएं कितने बड़े परिणाम खड़ी कर सकती है ये बात किसी से नहीं छुपी है l
देश और सैनिको की अस्मिता पर जो तृण मात्र भी आघात हो , ऐसे लोगो की ईंट से ईंट बजनी चाहिए,इन्हें मालूम हो वो सैनिक जो देश की रक्षा अपने प्राण दे कर करता है उसके सम्मान की रक्षा करना हमें भी आता है l ये कार्य सर्वप्रथम हो पाक का झंडा और नारा दूर की बात जिसे भी इस दोजख की याद भी आ जाय उसे बिल्कुल इल्म भी करा दिया जाय l
इतने भर से ही आधी समस्या ख़त्म हो जाएगी और आधी से फिर एक हाथ से भी लड़ लेंगे l
भारत हमारी शान
सिपाही देश का अभिमान l। मृदुल चन्द्र श्रीवास्ताव
जय हिन्द