सर्जिकल स्ट्राइक
हाथ खोल दो सेना के, कश्मीर क्या लाहौर भी गैर न होगा, जिस
घर भी तिरंगा न सजे, उसका खैर न होगा ll
भरने दो हुंकार इन्हें , मातृभूमि के अभिमान है वे,
बजने दो मृदंग, कर दो संखनाद ये
भारत भूमि का तिलक करो, नये अध्याय का प्रारम्भ करो,
दो एक कड़ा सन्देश उन्हें, जीने दें और प्रेम से जीना सीखलें,
आतंक के विनाश का प्रारम्भ करे, ये के अपने विनाश के दिन गिनना 😊llआरम्भ करें ll😊
स्वप्न लोक
मेरा क्या में तो वैराग्य लिए वैरागी हो जाऊं,
आँखें झपकूँ तो बुद्ध ,महावीर और कृष्ण भी कहलाऊँ,
यही सोच कर खुश हो लेता हूँ, 1 के बदले 100 की कसम में फिर लेता हूँ,
संग चलो स्वप्न लोक के , वो धन भी तुम्हें दिखलाता हूँ,
कल भी बोला था, फिर वही बात दुहराता हूँ,
चलो फिर, स्वप्न लोक में, उन्हीं नैनों की ओट में, कहो तो मैं फिर वो पम्पलेट छपवाता हूँ, 1 के बदले 100 की कसम में फिर दुहराता हूँ,
चलो स्वप्न लोक में वो धन तुम्हें दिखलाता हूँ ll
!! हे मानव !!
भूमिका ~
हाल में ही एक व्यक्ति (मांझी) ने अपनी पत्नी की मृत्यु के पश्चात अस्पताल से उसके मृत शरीर को कंधें पर लादे घर को निकल पडे, क्योंकि इस काम के लिए अस्पताल प्रशासन के पास तत्काल कोई सुविधा उपलब्ध नही थी,अब ऐसे घड़ी में जब उसके ऊपर ऐसा संकट हो, क्या अपेक्षा की जा सकती है कि व्याकुल और बदहवासी में व्यक्ति सही निर्णय लेगा ? नही की जा सकती, ऐसे में दायित्व अस्पताल प्रशासन का ही होता है, पूरे देश से, एक भी मदत की पेशकश नही आई जबकि पाक में आतंकी हमले में मरे लोग को मुद्राएं दान करने वाले लोग दिख जाते थे, फिर इस बारी क्या पता ?
एक विदेशी राजनयिक ने उसके परिवार, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सहयोग की पेशकश की जिसे जरूयत मंद, माझी ने स्वीकार भी किया l
ददलानी ने एक भद्र धार्मिक, सरल व्यक्ति पर ट्वीटर के माध्यम से आपत्ति जनक शब्द व चित्र साझा किए, निश्चय ही धर्मिक स्वतंत्रता और निजता उन्हें ये अधिकार देती है, ददलानी कुंठित हुए इस बात को भूल जाते है और फिर पूरे देश में धर्मयोगियो की धार्मिक भावनाएं आहत हो गईं l उत्तर प्रदेश के शामली/बुलंदशहर, नामक शहरो से दुराचार की विभत्स घटना प्रकाश में आती है, किन्तु इस बात पर यही धर्मवीर खामोश रह जाते हैंl
"धर्म मनुष्य के उत्तम जीवन जीने के लिए दिशा निर्देश है पर विडम्बना है कि धर्म के समक्ष इंसानियत की कोई कीमत ही शेष नही रहा ll
~ रचना ~
क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,कही स्वयं ही मृत हो, तो कही मृत की हड्डियां भी तोड़ देते हो,
मृत/परिवार को जो न दे सको संवेदना, पर भूल न जाओ वो दर्द, वो वेदना,
हे मानव, क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
सड़क पर चोटिल,लहूलुहान व्यक्ति के दुःख तो न हर लोगो ! पर उसे तड़पता देख मुख जरूर मोड़ लोगे,
धार्मिक हो पूजा पाठ करते हो, करो आराधना, पर तुम क्यों नहीं कर पाते हो सत्य का सामना,
हे मानव,
क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
कहीं स्वयं मृत हो तो कही मृतक की हड्डियां भी तोड़ देते हो,
कमी है देश में किस बात की वो बस, हाथ फेर दशा न बदल दें गरीबो की,
फिर क्यों विदेशों से भीख की पेशकश होने देते हो,
बताओ मुझे ददलानी पर शर्मिंदा हो, तो यहां मुख क्यों मोड़ लेते हो,
पैसे के लिए खुद्दारी की कीमत नही चुकाते हम,
मुह मोड़ लो तो क्या पर इस दुर्दशा के जिम्मेदार है हम,
हे मानव,
क्यों स्वयं के ही अस्तित्व को ही चुनौती देते हो,
कही खुद मित्र हो कही मृतक की हड्डियां तोड़ देते हो,
निर्भया, दामिनी, शामली इनके भी गुनहगार हैं हम,
पर देखो कहीं धर्म की हो न जाय खोटी,खींच लोगे तलवारें और बहादोगे तुम खून,
कभी सोचा है जो बह गया सडको पर,वो कितनी बड़ी थी भूल l
इस बात पर कब होंगे शर्मिन्दा,कब एक जुट हो करोगे तुम इसकी निंदा,
कब उठाओगे कर्तव्य - कर्म का भार,
कब करोगे ऐसे रावणो पे वार,
हे मानव, क्यों स्वयं के अस्तित्व को ही चुनौती देते हो, कही स्वयं मृत हो तो कहीं मृतक की हड्डियां तोड़ देते हो, कुछ कर्म है, कुछ धर्म भी, जीव से ही सत्कर्म भी,
फिर क्यों नही करते खुल कर इसकी निंदा, क्यों करते हो तुम इंसानियत को शर्मिंदा
मृदुल चंद्र श्रीवास्तव
अन्ना-आंदोलन
आंदोलन कहो या कहो तुम जीवन,जो चाहो दे लो नाम,चाहो तो कर लो अप-मान,पर सुनो, थी वो सत्य का ही ललकार, देखो झूठ पर जो किया प्रहार,वर्षो के उस अंध तंत्र को,भारत भूमि के नन्द वंश को, खोली उसने कब वो चोटी, बस पहन एक संत की टोपी,देखो कैसा आगाज हुआ था, स्तब्ध नन्द समाज हुआ था,
भारत भूमि के उस अन्धकार को,अहंकार के असत्य मॉन को फौलाद खडा जो घूर रहा था अकेले हर चुनौती क़ुबूल रहा था,गुरु आशीष लेे लिया उपवास, हठ योगी हठ को ठान,धरती हिली, भयभीत काल भी,
देखो वो कैसा अनुष्ठान हुआ था, कण-कण देशप्रेम और गुलजार हुआ था,
राज्य-नीति को जो कोस रहे थे,वो हैरत में सोच रहे थे,वेशभूषा का कैसा उपवन,
मुख पे क्रोध, देशप्रेम संग,
अबतक हम क्या सोच रहे थे, किस भ्रम में घर बैठ रहे थे l। वो सत्य-विजय का एक आगाज थी,जन-उपवन जंग छेड चुकी थी,शत्रु खेमा जो भयभीत हुआ था,बाई तो एक शुरुवात मात्र है,
अधूरे जंग की न सब आस है,
असहाय हो वो सोच रहे थे, क्या मजे का जीवन जी रहे थे, कौन बैठा हट को ठान, मांग रहा क्या वो अभय दान, नीति-रीति न कोई मार्ग था,
सत्य की हठ का क्या जवाब था,
विजय उसी दिन ही हो चुकी थी,मृत्यु द्वार से लौट चुकी थी,भारत भूमि के ज्येष्ठ राज्य में,जय-जयकार,ध्वनि गूज रही थी l।
ये जीत सत्य की आगाज थी, रणभूमि में जंग शुरू हुई थी, बढे चलो हे शौर्यवान, कुछ यूहीं करो भारती का मान, सेवा जितनी भी कर सकता हूँ,लेखनी पुष्प से अर्पित करता हूँ ll
मृदुल चंद्र श्रीवास्तव
"चल सको तो चलो"
चलो साथी जरा हाथ बढ़ाओ, कुछ ही कदम चलो पर साथ आ जाओ,
क्या पता कौन जाने ये सफर दूर तक चल पड़े,
गम न होगा, फिर न शिकवा न शिकायत होगी, दूर तक न सही, पर संग तो चलें,
जो डर हो कि डगर पर डगमगा जाऊंगा मैं,
भूल ही समझ लो पर लाज न गवाऊंगा मैं,
जुनून है जज्बा भी और जिगर भी रखता हूँ,जो कर सको यकी तो ये धूल झाड़ता हूँ,
जानता हूँ ये काम आसान न होगा,पर जो लड़ना ही है तो कोई भान न होगा,
छोड़ दो फ़िक्र सारी, तो इतना करो यकीन,
चंद्रगुप्त नही मैं,न दिखा पाउँगा सीना चीर,
सिधान्तो की क़ीमत पर , समझौते नहीं कर पाता हूँ, हार हो या के जीत,परिणाम को मुकाम तक पहुचाता हूँ, हार भी स्वीकार,जीत का सत्कार,पर बीच राह से लौट नहीं पता हूँ,
सिधान्तो की कीमत पर समझौते नहीं कर पाता हूँ l
मृदुल चंद्र श्रीवास्तव